विदिशा के बड़वासा के पास 32 एकड़ में विकसित हो रहा वैदिक गांव, बिजली और मोबाइल से दूरी बनाकर प्राकृतिक जीवन जी रहे परिवार
गुडडू किरार ✍️ मो- 9589362100
विदिशा/मंडीबामोरा- आधुनिक जीवन में बिजली, मोबाइल और इंटरनेट हमारी रोजमर्रा की जरूरत बन चुके हैं। दिन की शुरुआत मोबाइल स्क्रीन से और रात का अंत इंटरनेट व टीवी के साथ होना आम बात है। लेकिन विदिशा जिले में एक ऐसा गांव विकसित हो रहा है, जहां जीवन की रफ्तार इससे बिल्कुल अलग है। यहां शाम होते ही बिजली के बल्ब नहीं जलते, मोबाइल की घंटियां नहीं बजतीं और टीवी का शोर सुनाई नहीं देता। अंधेरा होने पर घरों में दीये और लालटेन रोशनी का सहारा बनते हैं। इस अनूठी जीवनशैली का नाम है भक्तिग्राम।
गंजबासौदा से करीब 28 किलोमीटर दूर बड़वासा गांव के समीप काल्हार स्टेशन रोड क्षेत्र में करीब 32 एकड़ में भक्तिग्राम विकसित किया जा रहा है। यह सामान्य ग्रामीण बस्ती नहीं, बल्कि वैदिक संस्कृति और प्राकृतिक जीवन पद्धति को व्यवहार में उतारने का प्रयास है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार परियोजना की शुरुआत वर्ष 2021 में हुई थी और इसी वर्ष भक्ति विकास स्वामी महाराज ने इसका उद्घाटन किया था।

बिजली नहीं, दीये और लालटेन से रोशनी
भक्तिग्राम की सबसे अलग पहचान यहां अपनाई गई जीवनशैली है। यहां बिजली और मोबाइल फोन का नियमित इस्तेमाल नहीं किया जाता। शाम ढलने के बाद कृत्रिम रोशनी के बजाय दीये और लालटेन जलाए जाते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्तमान में करीब 12 घरों में लगभग 60 लोग रह रहे हैं। बाहरी दुनिया से जरूरी संपर्क के लिए गांव में दो साधारण की-पैड मोबाइल फोन रखे जाने की जानकारी सामने आती है।
यह व्यवस्था किसी अभाव के कारण नहीं, बल्कि यहां रहने वाले लोगों की स्वैच्छिक जीवनशैली का हिस्सा है। शहरों की लगातार बढ़ती डिजिटल निर्भरता के बीच भक्तिग्राम में रहने वाले परिवार प्रकृति के अनुरूप दिनचर्या अपनाने का प्रयास कर रहे हैं।
गो-आधारित खेती और आत्मनिर्भरता पर जोर
भक्तिग्राम का उद्देश्य केवल आधुनिक उपकरणों से दूरी बनाना नहीं है। यहां एक ऐसी ग्रामीण व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें प्राकृतिक जीवन के साथ आत्मनिर्भरता को भी महत्व मिले। आधिकारिक जानकारी के अनुसार गो-रक्षा, गो-आधारित कृषि, जैविक खेती और पारंपरिक जीवन पद्धति को प्रमुखता दी जा रही है।
गांव में गौशाला, खेती, वैदिक गुरुकुल और पारंपरिक कला-कौशल से जुड़े कार्यों को विकसित किया जा रहा है। खेती और पशुपालन को एक-दूसरे से जोड़कर स्थानीय स्तर पर आवश्यकताओं की पूर्ति करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
मिट्टी, बांस और स्थानीय सामग्री से बन रहे घर
भक्तिग्राम के मकानों की बनावट भी इसकी अलग पहचान है। यहां निर्माण में मिट्टी, स्थानीय पत्थर, खजूर की लकड़ी और बांस जैसी प्राकृतिक एवं स्थानीय सामग्री के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। इसके लिए आसपास के बड़वासा क्षेत्र की पारंपरिक ग्रामीण वास्तुकला और स्थानीय जीवनशैली का अध्ययन किए जाने की जानकारी है।इस तरह यहां आधुनिक कॉलोनी की तर्ज पर निर्माण करने के बजाय स्थानीय वातावरण और पारंपरिक ज्ञान को केंद्र में रखकर बस्ती विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
डॉक्टर और इंजीनियर भी छोड़ चुके शहर की भागदौड़
भक्तिग्राम की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां आने वाले लोगों में केवल पारंपरिक ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले लोग ही शामिल नहीं हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में नर्मदापुरम के नर्मदादास, जो पेशे से डॉक्टर हैं, का उल्लेख मिलता है। वहीं उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के राजकुमार यादव के बारे में बताया गया है कि वे टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी इंजीनियर रह चुके हैं। शहरों में शिक्षा और पेशेवर जीवन का अनुभव रखने वाले इन लोगों का इस तरह की जीवनशैली चुनना इस प्रयोग को और खास बनाता है।
स्थायी रहने से पहले छह महीने का अनुभव
भक्तिग्राम में किसी परिवार के स्थायी रूप से बसने की प्रक्रिया भी सामान्य नहीं बताई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इच्छुक परिवार पहले गांव में एक दिन रहकर व्यवस्था को समझते हैं। इसके बाद उन्हें करीब एक महीने बाद छह दिन के लिए आने का अवसर दिया जाता है। फिर परिवार को छह महीने तक यहां रहकर इस जीवनशैली का अनुभव करना होता है। इसके बाद ही स्थायी रूप से रहने का विकल्प मिलता है। यानी शहर की सुविधाओं को छोड़कर यहां बसने का फैसला अचानक नहीं, बल्कि जीवनशैली को करीब से समझने के बाद लेने की व्यवस्था बताई गई है।
गुरुकुल में अनुशासन और वैदिक दिनचर्या
भक्तिग्राम में बच्चों की शिक्षा के लिए गुरुकुल व्यवस्था विकसित की जा रही है। यहां दिन की शुरुआत तड़के धार्मिक गतिविधियों से होती है। उपलब्ध आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार सुबह 4:30 बजे मंगल आरती, 7:15 बजे गुरु पूजा, शाम 6 बजे भागवत कक्षा और शाम 7 बजे आरती-कीर्तन का कार्यक्रम निर्धारित है।
गुरुकुल व्यवस्था में बच्चों को अनुशासन, नियमित दिनचर्या, धार्मिक अध्ययन और पारंपरिक शिक्षा पद्धति से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बच्चों के लिए रात करीब 8 बजे तक सोने और सुबह जल्दी उठने की दिनचर्या निर्धारित है।
गायों को परिवार का हिस्सा मानने की कोशिश
भक्तिग्राम में पशुपालन भी जीवन पद्धति का अहम हिस्सा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां गुजरात की पुरानी देसी नस्ल की करीब एक दर्जन गायें हैं। रिपोर्टों में बताया गया है कि दूध को व्यावसायिक रूप से बेचने के बजाय आवश्यकता के अनुसार ही निकाला जाता है और शेष दूध बछड़ों के लिए छोड़ा जाता है।
यह व्यवस्था पशुपालन को केवल आय का साधन मानने के बजाय गांव की समग्र आत्मनिर्भर व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश के रूप में सामने आती है।
विकास की परिभाषा पर भी सवाल
भक्तिग्राम का प्रयोग केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह आधुनिक जीवनशैली और विकास की हमारी स्थापित धारणा पर भी सवाल खड़ा करता है। क्या विकास का मतलब केवल अधिक बिजली, इंटरनेट, मोबाइल और उपभोग है, या कम जरूरतों में प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीना भी विकास का एक विकल्प हो सकता है?
हालांकि भक्तिग्राम को पूरे देश के लिए आदर्श मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। यह एक विशेष उद्देश्य से विकसित की जा रही वैदिक कम्युनिटी है और यहां की जीवनशैली हर व्यक्ति के लिए सहज हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन आधुनिक सुविधाओं से भरी जिंदगी के बीच कुछ लोगों का स्वेच्छा से इस तरह का जीवन चुनना निश्चित रूप से चर्चा का विषय है।
दीये की रोशनी में तलाशा जा रहा सुकून
भक्तिग्राम की सबसे बड़ी कहानी शायद यही है कि यहां अंधेरे को समस्या नहीं माना जाता। सूर्यास्त के बाद दीये और लालटेन जलते हैं और जीवन अपनी स्वाभाविक गति से चलता रहता है। मोबाइल की अनुपस्थिति बातचीत को खत्म नहीं करती, बल्कि लोगों को आमने-सामने बैठने का अवसर देती है। शहरों में रोशनी बढ़ी है, लेकिन व्यस्तता भी बढ़ी है। यहां रोशनी कम है, मगर प्रकृति के साथ तालमेल और सामुदायिक जीवन को महत्व दिया जा रहा है।
भक्तिग्राम आधुनिकता से पूरी तरह लड़ने का दावा नहीं करता, बल्कि जीवन के एक अलग विकल्प को सामने रखता है। मिट्टी के घर, दीये की लौ, गो-आधारित खेती और वैदिक दिनचर्या के बीच यह प्रयोग एक सवाल जरूर छोड़ता है—सुविधाएं बढ़ने के साथ क्या जीवन वास्तव में बेहतर हो रहा है, या कभी-कभी कम सुविधाओं में भी सुकून की तलाश की जा सकती है?

