विदिशा के रावण गांव में सदियों पुरानी परंपरा, हर मांगलिक कार्य से पहले रावण मंदिर में माथा टेकते हैं ग्रामीण
घरों के दरवाजों से पंचायत भवन तक अंकित है ‘जय लंकेश’, दूसरे शहरों में बसे ग्रामीण भी निभाते हैं परंपरा
गुड्डू किरार ✍️ मो- 9589362100
विदिशा/नटेरन। देशभर में जहां दशहरे के अवसर पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं विदिशा जिले की नटेरन तहसील में एक ऐसा गांव भी है, जहां रावण को जलाने के बजाय उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। रावण के नाम से पहचाने जाने वाले इस गांव में लंकेश के प्रति आस्था और परंपरा का ऐसा अनूठा स्वरूप दिखाई देता है, जो इसे दूसरे गांवों से अलग पहचान दिलाता है। यहां रावण केवल धार्मिक मान्यता का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीणों की परंपरा और सामाजिक जीवन का भी हिस्सा हैं।
हर मांगलिक कार्य से पहले लंकेश के दरबार में हाजिरी
गांव में शादी-विवाह सहित किसी भी मांगलिक या धार्मिक आयोजन की शुरुआत करने से पहले ग्रामीण रावण मंदिर पहुंचते हैं। यहां पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लेने के बाद ही आयोजन की अन्य गतिविधियां शुरू की जाती हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि शुभ कार्यों से पहले लंकेश की पूजा करना उनकी वर्षों पुरानी परंपरा है, जिसका आज भी पूरी श्रद्धा के साथ पालन किया जा रहा है।
घर-घर में ‘जय लंकेश’, पंचायत भवन पर भी अंकित
गांव में रावण के प्रति आस्था के प्रतीक केवल मंदिर तक सीमित नहीं हैं। कई ग्रामीणों के घरों के दरवाजों पर ‘जय लंकेश’ लिखा हुआ दिखाई देता है। लोग अपने हाथों पर भी ‘जय रावण’ और ‘जय लंकेश’ लिखवाते हैं। गांव के पंचायत भवन के मुख्य द्वार पर भी ‘जय लंकेश’ अंकित है। यह दृश्य बताता है कि यहां रावण से जुड़ी मान्यताएं ग्रामीण जीवन में कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं।
दशहरे पर मंदिर में धार्मिक आयोजन और भंडारा
जब देश के अनेक हिस्सों में दशहरे के दिन रावण दहन के आयोजन होते हैं, तब इस गांव में रावण मंदिर में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस अवसर पर पूजा-अर्चना के साथ भंडारे का आयोजन भी होता है, जिसमें ग्रामीण श्रद्धापूर्वक शामिल होते हैं। इस तरह यहां दशहरे की परंपरा देश के प्रचलित आयोजनों से अलग दिखाई देती है।
तालाब की मिट्टी को लेकर भी है मान्यता
मंदिर के सामने स्थित तालाब की मिट्टी को लेकर भी ग्रामीणों के बीच एक विशेष मान्यता प्रचलित है। ग्रामीणों का कहना है कि इस मिट्टी से स्नान करने पर चर्म रोगों में लाभ मिलता है। हालांकि, इस मान्यता की चिकित्सकीय पुष्टि के संबंध में जानकारी उपलब्ध नहीं है।
दूसरे शहरों में रहने वाले ग्रामीण भी नहीं भूले परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, गांव का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है और इसकी पहचान रावण के नाम से जुड़ी हुई है। गांव के जो लोग रोजगार, व्यवसाय या अन्य कारणों से दूसरे शहरों में जाकर बस गए हैं, वे भी रावण देवता के प्रति अपनी आस्था बनाए हुए हैं और वहां भी पूजा-अर्चना करते हैं। स्थान बदलने के बावजूद परंपरा से जुड़े रहना इस गांव की विशिष्ट पहचान को दर्शाता है।
आस्था और परंपरा का अनूठा केंद्र
नटेरन तहसील का रावण गांव धार्मिक मान्यताओं की विविधता का एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहां रावण मंदिर, घरों पर लिखे जयकारे, पंचायत भवन पर अंकित संदेश और मांगलिक कार्यों से पहले पूजा की परंपरा मिलकर गांव की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाते हैं। ग्रामीणों के लिए लंकेश की पूजा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा को जीवित रखने का माध्यम है।

